देश सेवा के बाद प्राकृतिक खेती से धरा की सेवा कर रहे युद्धवीर सिंह

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युद्धवीर सिंह

कांगड़ा जिला के इंदौरा विकास खण्ड से संबंध रखने वाले युद्धवीर सिंह क्षेत्र में सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती के प्रणेता बनकर उभरे हैं। युद्धवीर सिंह ने बप्पू पंचायत के दरयाड़ी गांव में प्राकृतिक खेती का सफल मॉडल खड़ा किया है जिससे वे आस-पास के किसानों को भी इस खेती के प्रति प्रेरित कर रहे हैं। कारगिल वार में भाग ले चुके युद्धवीर सिंह जब 2016 में बीएसएफ से रिटायर हुए तो उनके सामने दो विकल्प थे। पहला आस-पास नौकरी तलाशने का और दूसरा खेती करने का। उन्होंने खेती का विकल्प चुना और जोरशोर से क्षेत्र में प्रचलित रसायनिक खेती करने लगे। युद्धवीर ने बताया कि वे लगभग 2 साल रसायनिक पद्धति से खेती करते रहे, लेकिन रसायनों के बढ़ते प्रयोग के चलते उनका मन इस खेती से उचटने लगा। वे विकल्प तलाश ही रहे थे इसी दौरान 2018 में उन्होंने शिमला में एक संवेदीकरण कार्यक्रम में हिस्सा लिया जहां तत्कालीन राज्यपाल आचार्य देवव्रत के भाषण से वह गहरे प्रभावित हुए। इसके बाद उन्होंने पालमपुर विश्वविद्यालय में प्राकृतिक खेती के जनक सुभाष पालेकर से इस खेती का प्रशिक्षण लिया और प्राकृतिक खेती करना शुरू कर दिया। युद्धवीर ने बताया कि देसी गाय प्राकृतिक खेती का मूल आधार है। इसलिए वे जालंधर से साहीवाल किस्म की गाय लेकर आए हैं। इस गाय के गोबर और गोमूत्र आधारित जीवामृत, घनजीवामृत, सप्तधान्यांकुर और खट्टी लस्सी का वे अपने खेतों में प्रयोग कर रहे हैं जिसके उन्हें अच्छे परिणाम मिल रहे हैं।

20 कनाल में कर रहे प्राकृतिक खेती
युद्धवीर सिंह लगभग 20 कनाल भूमि में प्राकृतिक विधि से खेती कर रहे हैं। उन्होंने अपने खेतों से लौकी, घीया, भिंडी, मक्का और धान की फसलें सफलतापूर्वक लेकर 1 लाख 17 हजार का मुनाफा कमाया है। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक विधि से तैयार फसलों में रसायनिक के मुकाबले साफ अंतर देखने को मिल रहा है। जहां फसलों की सेल्फ लाइफ बढ़ी है वहीं उनके स्वाद में भी साफ अंतर दिख रहा है। प्राकृतिक होने की वजह से उनकी फसलें अच्छे दाम में बिक रही हैं।
युद्धवीर का कहना है कि रसायनिक खेती जमीन और सेहत दोनों के लिए नुक्सानदेह है। जब वह रसायनिक खेती कर रहे थे तो खेतों में छिड़काव के दौरान उनकी सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा था। जब भी वह किसी दवाई का छिड़काव करते तो उनका सिर भारी हो जाता और रातभर बेचैनी रहती थी। दवाई लेने के लिए आस-पास के डाक्टरों के पास जाना पड़ता था। अब प्राकृतिक खेती के दौरान कोई स्वास्थय समस्या पेश नहीं आ रही। वह खुशी से अपने बनाए आदानों का खेती में प्रयोग कर रहे हैं।
युद्धवीर के अनुसार क्षेत्र का किसान अपने स्वास्थय के प्रति जागरूक हो रहा है। उनके साथ 40 किसानों का एक समूह जुड़ा है जो प्राकृतिक खेती कर रहा है। इस समूह के किसानों का वह समय-समय पर मार्गदर्शन कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक खेती के लिए जरूरी आदान भी वह अपने संसाधन भंडार से उन्हें मुहैया करवा रहे हैं। युद्धवीर का लक्ष्य है अपने गांव को प्राकृतिक खेती मॉडल गांव के रूप में स्थापित करना है।
प्राकृतिक खेती के लिए यह दे रही सरकार
प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के अंतर्गत शुरू की गई सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती कर रहे किसानों को सरकार प्रोत्साहित कर रही है। किसानों को देसी गाय की खरीद पर 50 प्रतिशत अनुदान दिया जा रहा है। गोमूत्र एकत्रीकरण के लिए गोशाला नालीकरण हेतु 8,000 रूपए की उपदान राशि दी जा रही है वहीं खेती के लिए जरूरी आदान बनाने के लिए 750 रूपए की दर से 3 ड्रम भी किसानों को मुहैया करवाए जा रहे हैं।

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