प्राकृतिक खेती का सफल मॉडल तैयार कर ओम प्रकाश ने की एग्रो टूरिज्म की शुरूआत

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Rohit Kumar Vashishat: हिमाचल के टूरिज्म हब कुल्लू जिले में अब एग्रो टूरिज्म बढ़ रहा है। पर्यटकों के पसंदीदा इस जिला के किसान एग्रो-टूरिज्म के जरिए अपनी आजीविका बढ़ा रहे हैं। खेती और पर्यटन को जोड़ने वाली इस अवधारणा को नग्गर विकास खंड के प्राकृतिक खेती किसान ओम प्रकाश भी मूर्त रूप दे रहे हैं। ITBP से सेवानिवृत्त त्रयांवली गांव के ओम प्रकाश ने जहां प्राकृतिक विधि से अपनी खेती लागत को कम किया है वहीं पर्यटकों को ग्रामीण क्षेत्रों की तरफ रिझाने के लिए अपने सफल खेती मॉडल के जरिए एग्रो-टूरिज्म का काम भी कर रहे हैं।

अपने मॉडल फार्म पर ओमप्रकाश

पूर्व सैनिक ओम प्रकाश ने बताया कि सेना में सेवा के दौरान वह देश के अलग-अलग हिस्सों में रहे। एग्रो-टूरिज्म के बढ़ते चलन को उन्होंने पहली बार दक्षिण भारत के राज्यों में देखा। सेना से ऐच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद उन्होंने पुरानी खेती को दुबारा उबारा और एग्रो-टूरिज्म साइट बनाने की दिशा में जुट गए। आज देश-विदेश के पर्यटक उनके खेतों में पहुंच रहे हैं जिन्हें वह प्राकृतिक खेती के बारे में भी बता रहे हैं।

ओम प्रकाश ने 2019 में सेवानिवृत्ति के बाद प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा लिया। पंचायत स्तर के इस शिविर में कृषि अधिकारियों से प्राकृतिक खेती की आवश्यकता और प्रासंगिकता के साथ आदानों के निर्माण की व्यावहारिक जानकारी मिलने के बाद उन्होंने इस खेती की शुरूआत की। उन्हें प्राकृतिक खेती के सबसे अच्छे परिणाम राजमाश और मक्की में देखने को मिले। इन दोनों फसलों की गुणवत्ता और आकार इतना बेहतर आया कि उनके पड़ोसी और रिश्तेदार भी अचंभित हो गए।

मॉडल फार्म

3 बीघा क्षेत्र में सफल किसान ओम प्रकाश सेब, जापानी फल, अनार, मटर, राजमाह, गेंदा, मक्की और कोदा उगा रहे हैं। वह कहते हैं कि प्राकृतिक खेती से सभी फसलों की उपज बढ़ी है। कोरोना महामारी के बावजूद प्राकृतिक विधि से तैयार उनकी मक्की को खरीदने दूर-दूर से लोग आए हैं। उन्होंने बताया कि पिछले साल क्षेत्र के बागीचों में आकस्मिक पतझड़ रोग आया। प्राकृतिक खेती आदानों से उनके बागीचे में आकस्मिक पतझड़ रोग का प्रकोप साथी बागीचों की तुलना में कम रहा। ओमप्रकाश का खेता-बागवानी खर्च भी पहले की तुलना में 8 गुना कम हुआ है। जहां पहले 40 हजार का खर्च आ रहा था वहीं अब यह घटकर 7 हजार ही रह गया है।   

ओम प्रकाश कहते हैं कि प्राकृतिक खेती का किचन-गार्डन मॉडल इस विधि के प्रसार में बहुत मददगार साबित हो रहा है। उनके गांव में महिलाएं किचन-गार्डन में प्राकृतिक विधि का प्रयोग कर रही हैं और संतोषजनक नतीजे मिलने पर इसे खेतों में भी अपना रही हैं। किसान समुदाय के बीच इस खेती विधि का प्रसार बड़ी तेजी से हो रहा है। मैं व्यक्तिगत तौर पर नए किसानों को घर की देसी गाय के गोबर-गोमूत्र के साथ अन्य आदान निःशुल्क दे रहा हूं। 

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