आसान नहीं भाजपा को मिशन रिपीट करना

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आसान नहीं भाजपा को मिशन रिपीट करना

  • भाजपा में सुलग रहीं चिंगारियां
  • तीन साल में सरकार में कई फेरबदल होने के बाद रिपीट करना हो रहा असंभव
    हिमाचल प्रदेश में मौजूद सत्ता की चाबी भले भाजपा के हाथ में हो। लेकिन भाजपा 2022 में फिर से सत्ता हासिल कर लें। इसके लिए राहों में कांटे बहुत है। इतने कांटे कांग्रेस ने नहीं बिछाएं जितने सरकार की नीतियों व संगठन में समन्वय की कमी के कारण दिखते आ रहे है। धर्मशाला में प्रदेश कार्य समिति की बैठक होने जा रही है। इसमें मुख्य तौर पर चर्चा आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर जरूर होगी। इसके साथ ही पंचायत चुनावों की परफारमेंस को लेकर भी मंत्रणा होगी। मगर पिछले तीन सालों के कार्यकाल में कुछ इतना बड़ा नहीं हुआ है कि जिससे भाजपा रिपीट का सपना साकार हो सके। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सिर्फ नरेंद्र मोदी और अमित शाह की रणनीति के अलावा कोई अचूक तरीका प्रदेश भाजपा के पास नहीं है। प्रदेश सरकार की कार्य प्रणाली में हावी हो चुकी अफसरशाही के कारण जो सवाल सरकार पर लगते आ रहे है। उनसे पिछा छूटता नजर नहीं आ रहा है। ढाई साल के कार्यकाल में सरकार ने मंत्रीमंडल में फेरबदल व विस्तार तक कर दिया था। लेकिन फिर सरकार का एक्टिव मोड दिख नहीं रहा है। यहां तक मुख्यमंत्री कार्यालय में आला अफसरों को हटा दिया। हैरानी तो इस बात की है कि जिन युवा अफसरों को सरकार बनते ही लगाया गया था उनसे भरोसा हटाकर रिर्टायड अफसर अगले दिन ही मुख्यमंत्री कार्यालय में लगा दिया। इससे जहां भाजपा के विचार से संबध रखने वाले अफसरशाही नाराज है। बल्कि कई नेता भी नाखुश नजर आ रहे है। यहां तक कि मुख्यमंत्री के एक ओएसडी को हटाए जाने की चर्चाएं कई महीनों तक राजनीतिक गलियारों में रही है। भाजपा संगठन और सरकार में समन्वय भी कुछ खास दिखता नजर नहीं है। भाजपा ने नए चेहरों की टीम तो तैयार की है लेकिन इसमें जयराम गुट के नेताओं को कोई तरजीह ही नहीं दी गई है। भाजपा ने सत्ता में आने से पहले कहा कि एक व्यक्ति का संगठन में एक ही पद रहेेगा। लेकिन कई ऐसे नेता है भाजपा में जिनके पास संगठन और सरकार दोनों में पद मिले। इसके बाद कहा था कि विधानसभा चुनावों में हारे हुए नेताओं को सरकार में तरजीह नहीं दी जाएगी। लेकिन हारे हुए नेताओं जिन्हें एडजस्ट किया। पार्टी से टिकट न मिलने के बाद बागी नेताओं को पार्टी ने ये बोलकर बिठा दिया था कि उन्हें सरकार में एडस्ट किया जाएगा। लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्हें एडजस्ट नहीं किया गया।
  • प्रदेश भाजपा के सभी मोर्चा में आजकल केवल महिला मोर्चा सक्रिय दिखता है जिसके कार्यक्रम आए दिन होते है। इसके अलावा अन्य संगठनों के कार्यक्रम नामात्र ही रह गए है। प्रदेश सरकार ने तीन साल के कार्यकाल के अंदर स्वास्थ्य मंत्री रहे विपिन परमार को पार्टी ने मंत्री पद से हटा दिया। इसके बाद डा़ राजीव बिंदल को पार्टी प्रदेशाध्यक्ष के पद से हटा दिया। ये सब सुनने में छोटा लग सकता है लेकिन भाजपा के अंदर ऐसी कई चिंगारियां सुलग रही है जो कि मिशन रिपीट को आग लगा सकती है। अभी हाल ही में हुए पंचायत चुनावों के परिणाम भी भाजपा के लिए सही नहीं है । पार्टी ने चुनाव चिन्ह पर चुनाव न लड़कर पहले ही अपनी आधी हार तय कर दी थी। इसके बाद भाजपा के विधायकों ने कई जगह अपने केंडिडेट दिए हुए थे जिन्हें भाजपा के ही बागाी प्रत्याशियों ने हरा दिया। जब बागी जीत गए तो भाजपा के विधायक बागी प्रतिनिधियों को पार्टी में शामिल करके अपनी जीत का नगाड़ा बजा रहे थे। दिलचस्प बात तो यह है कि मंडी जिला में भाजपा के पास जिला परिषद में पूर्ण बहुमत था लेकिन चैयरमैन पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले प्रतिनिधि को बना दिया गया। इसका क्या अर्थ समझा जाए पार्टी के खिलाफ लड़ो जीत कर आओ और सम्मान पाओ। कई जिलों में पार्टी ने लिखकर दिया था कि जो पार्टी के खिलाफ लड़ेगा उसके खिलाफ कारवाई अमल में लाई जाएगी। लेकिन जीत कर आने वाले बागियों पर संगठन की ये तलवार नहीं चली है । हैरानी तो इस बात कि जब विपक्ष मुख्यमंत्री पर कई आरोप लगाता है तो भाजपा ने मंत्री, विधायक मुख्यमंत्री के पक्ष में बोलने से कतराते है। संगठन सिर्फ चैयरमैनों की ओर से प्रैस नोट जारी करवा देता है। संगठन और सरकार में समन्वय की कमी का खामियाजा मिशन रिपीट में तो होगा ही । इसके साथ ही संगठन की साख पर भी सवाल उठेेंगे। कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके है। कुछ के तो विभाग तक बदल डाले थे। भाजपा ने सत्ता में आने से पहले कांग्रेस सरकार के खिलाफ चार्जशीट बनाई थी। लेकिन आज तक एक भी मामला उस चार्जशीट के आरोपों के आधार पर नहीं हो सका है जबकि उसमें करोड़ों रूपये के घोटालों के आरोप थे। इस बात को लेकर भी भाजपा कार्यकर्ताओं में काफी नाराजगी है। कर्मचारी वर्ग में पुरानी पैंशन का मुददा सरकार को कइ मुश्किलों में डाल सकता है। अनुबंध कर्मियों को वरिष्ठता डेट आफ ज्वाईनिंग से न देना, अनुबंध कार्यकाल कम न करना, आउटसोर्स कर्मियों के लिए नीति न बनाना आदि ऐसे मुददे है जो सरकार को सत्ता से दूर कर सकते है।
    संघ भी सरकार से नाखुश राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा है कि संघ सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर खुश नहीं है। मुख्यमंत्री समेत कई मंत्री नेताओं की बैठक नाभा में कार्यप्रणाली सुधारने को लेकर संघ नेतृत्व के साथ हो चुकी है। संघ ने कई निर्देश सरकार और संगठन को दिए है । अगर उनके मुताबिक सुधार नहीं किया तो भी भाजपा के लिए मुसीबतें खड़ी हो सकती हैै।

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