प्रदेश शून्य लागत प्राकृतिक कृषि एवं बागवानी को बढ़ावा देगाः मुख्यमंत्री

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राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने हिन्दू नववर्ष की पूर्व संध्या पर कहा कि यह दिन हिमाचल प्रदेश के लिए ऐतिहासिक दिन है, क्योंकि आज राज्य सरकार ने प्राकृतिक खेती की दिशा में क्रान्तिकारी कदम उठाया है। उन्होंने आशा जताई की निकट भविष्य में हिमाचल देश में प्राकृतिक कृषि का आदर्श राज्य होगा तथा अन्य राज्य भी इसका अनुसरण करेंगे।
राज्यपाल आज यहां कृषि विभाग द्वारा आयोजित ‘शून्य लागत प्राकृतिक कृषि’ सम्मेलन में बतौर मुख्यातिथि बोल रहे थे। मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने सम्मेलन की अध्यक्षता की। राज्यपाल ने प्रदेश में प्राकृतिक कृषि को आरम्भ करने के प्रयासों तथा आगामी वित्तीय वर्ष के दौरान इस क्षेत्र के लिए 25 करोड़ रुपये के बजट प्रावधान प्रस्ताव के लिए मुख्यमंत्री की सराहना की।
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उन्होंने कहा कि पूरे विश्व में जैविक उत्पादों के नाम पर उद्योग स्थापित करने के कारण जैविक कृषि किसानों के लिए अब लाभकारी नहीं है तथा रसायनिक खादों के कारण कृषि की लागत में वृद्धि हो रही है, जिससे स्पष्ट होता है कि किसानों के उत्पीड़न पर रोक नही लगी है। उन्होंने कहा कि रसायनिक खादों का अत्यरधिक उपयोग जैविक कार्बन स्तर में कमी लाता है तथा पंजाब तथा हरियाणा के कुछ खेतों में यह स्तर 0.3 तक पहुंच चुका है। आचार्य देवव्रत ने कहा कि शून्य लागत प्राकृतिक कृषि प्रणाली ही केवल मात्र रसायनिक व जैविक खेती का विकल्प है। यह कृषि सुरक्षित है व किसानों की आय को दोगुना करने की क्षमता रखती है। इस प्रणाली के अन्तर्गत उत्पादन लागत शून्य रहती है और उत्पाद भी बिल्कुल शुद्ध होते हैं। इससे भूमि की उत्पादकता में भी वृद्धि होती है और इसके लिए पानी की भी कम जरूरत होती है। इस कृषि से मित्र-कीट की सुरक्षा करने के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार करने में भी सहायता मिलती है।

उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती ने अपनी कामयाबी से सफलता को सिद्ध कर दिया है जो अन्यों के लिए भी एक उदाहरण है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दशकों में रसायनिक खेती के अंधाधुंध प्रयोग के कारण अनेक बीमारियों में बढ़ौतरी हुई है और अब समय आ गया है कि हम रसायनिक खेती को छोड़कर प्राकृतिक खेती को अपनाएं। उन्होंने कहा कि एक स्थानीय गाय 30 एकड़ भूमि में खेती करने में सहायक हो सकती है और इससे मिट्टी की उर्वरता में भी सुधार आएगा और कम पानी के उपयोग से अधिकतम उत्पादन होने के साथ-साथ किसानों को उनके उत्पादों का बेहतर मूल्य मिलेगा। रज्यपाल ने प्रदेश में बंदरों के उत्पात पर भी चिन्ता व्यक्त की तथा कहा कि किसान इस प्रमुख समस्या को लेकर उनके पास भी आए हैं। इसके उपरान्त राज्यपाल ने किसानों के साथ विचार-विमर्श में भी भाग लिया।
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मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने इस अवसर पर कहा कि शून्य लागत प्राकृतिक कृषि न केवल मिट्टी की उर्वरता एवं मिट्टी की जैविक मात्रा में निरतंर वृद्धि करती है, बल्कि किसानों की आर्थिकी में भी बदलाव लाने की क्षमता भी रखती है। उन्होंने कहा कि हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य के लिए इस प्रकार की कृषि उपयुक्त है, क्योंकि यहां पर लोगों के पास कम भूमि है तथा किसान ज्यादातर देसी नस्ल के पशुओं का पालन करते हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश की मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में सभी आवश्यक पोषक तत्व मौजूद है, इसलिए यहां रसायनिक खादों के प्रयोग की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार प्रदेश में शून्य लागत प्राकृतिक कृषि को प्रोत्साहित करना चाहती है, ताकि कृषि की लागत में कमी लाई जा सके, लेकिन शून्य लागत कृषि को अपनाने के लिए किसानों को प्रेरित करना अभी भी एक चुनौती है, क्योकि वर्षों से वह कृषि में रसायनिक खादों का प्रयोग कर रहे है।

जय राम ठाकुर ने कहा कि राज्य सरकार ने 25 करोड़ रुपये की लागत की ‘प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान’ नामक एक नई योजना प्रस्तावित की है। उन्होंने कहा कि इस योजना के अन्तर्गत प्रदेश के किसानों को प्रशिक्षण तथा आवश्यक उपकरण प्रदान किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि शून्य लागत प्राकृतिक कृषि से कृषि प्रणाली में क्रान्ति लाई जा सकती है, बशर्ते किसान प्राकृतिक कृषि को अपनाएं। उन्होंने कहा प्रकृति में हमारी सभी आवश्यकताओं को पूरी करने की क्षमता है, लेकिन लालच की कोई सीमा नहीं है।
मुख्यमंत्री ने शून्य लागत कृषि, स्वच्छता अभियान, बेटी बचाओ अभियान, गौवंश की सुरक्षा तथा नशा निवारण जैसे जनहित मामलों पर राज्यपाल आचार्य देवव्रत द्वारा किए गए प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि आचार्य देवव्रत जैसे मार्गदर्शक का राज्यपाल होना प्रदेश के लिए गौरव व सोभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि मंत्री तथा अधिकारियों के एक दल ने हाल ही में प्राकृतिक कृषि को समझने के लिए आचार्य देवव्रत के कुरूक्षेत्र स्थित गुरूकुल का दौरा किया। दल के सभी सदस्य आश्वस्त थे कि कृषि में लागत को कम करने का सबसे सफल तरीका प्राकृतिक कृषि ही है।

ठाकुर ने कहा कि प्रदेश सरकार ने अपनी पहली मंत्रिमण्डल की बैठक में गौवंश को बढ़ावा देने के सुझाव के लिए एक मंत्रिमण्डलीय उप समिति गठित करने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि इस निर्णय से स्थानीय गायों के पालन व शून्य लागत प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिलेगा। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार ने हि.प्र. धार्मिक संस्थान एवं मंदिर न्यास अधिनियम में भी संशोधन का प्रस्ताव किया है ताकि मंदिरों के चढ़ावे में से 15 प्रतिशत राशि गऊ सदनों के निर्माण व रख-रखाव व्यय किए जा सकें। उन्होंने कहा कि इसके अतिरिक्त गौवंश संरक्षण के लिए शराब की प्रति बोतल बिक्री पर एक रुपये कर (सैस) के रूप में लगाना प्रस्तावित है। यह सभी कदम प्रदेश में शून्य लागत आधारित खेती को बढ़ावा देने में सहायक होंगे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार राज्य में शून्य लागत प्राकृतिक बागवानी को भी बढ़ावा दे रही है। किसानों और कृषि विभाग के विस्तार कर्मियों, बागवानी व पशुपालन विभाग के कर्मियों को शून्य लागत प्राकृतिक कृषि का प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि किसान उत्पादन लागत पर भारी खर्च आने के कारण स्वयं को कर्जों के बोझ तले दबा महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश के इतिहास में पहली बार वर्ष 2018-19 के प्रस्तावित बजट में 28 नई योजनाओं को शामिल किया गया है तथा कृषि एवं बागवानी पर विशेष ध्यान दिया गया है।

ठाकुर ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी शून्य लागत प्राकृतिक कृषि को अपनाने पर बल दिया है। इससे सरकार के वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। उन्होंने अपने मंत्रिमण्डल सहयोगियों को शून्य लागत प्राकृतिक कृषि को अपनाने को कहा ताकि अन्य किसान इसके लिए प्रोत्साहित हो सकें। राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री ने कृषि विभाग द्वारा जैविक उत्पादों को प्रदर्शित कर रहे प्रदर्शनी स्टॉलों का भी दौरा किया। अतिरिक्त मुख्य सचिव कृषि डॉ. श्रीकान्त बाल्दी ने जैविक कृषि पर पावर पॉइंट प्रस्तुति दी तथा कहा कि जहां तक रसायनिक खादों तथा कीटनाशकों का सम्बन्ध है, तो राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले हिमाचल में स्थिति कहीं ज्यादा बेहतर है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रति हैक्टेयर 141 किलो रसायनिक खाद के मुकाबले प्रदेश में केवल 59 किलो रसायनिक खाद प्रति हैक्टेयर का उपयोग किया जा रहा है। इसी प्रकार पंजाब में प्रति हैक्टेयर 1164 ग्राम कीटनाशक के मुकाबले प्रदेश में केवल प्रति हैक्टेयर 158 ग्राम कीटनाशक का प्रयोग किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि लगभग 40 हजार किसान जैविक खेती कर रहे हैं।

आन्ध्र प्रदेश सरकार के कृषि सलाहकार डॉ. टी विजय कुमार ने किसानों की समस्या का समाधान करने के लिए प्राकृतिक कृषि को आरम्भ करने के लिए मुख्यमंत्री का धन्यवाद किया तथा कहा कि वर्तमान में प्रचलित कृषि विज्ञान प्रचलन मौसम परिवर्तन में उपयुक्त नहीं है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक कृषि से उत्पादन लागत में कमी आती है तथा मिट्टी की उरर्वता, जल संरक्षण, ईको संतुलन में वृद्धि होती है। कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के जैविक खेती विभाग के अध्यक्ष डा. जे.पी.सैणी ने आन्ध्र प्रदेश में प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों की सफलता की कहानियों को सांझा किया।

हि.प्र. विधानसभा के अध्यक्ष डा.राजीव बिन्दल, शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज, ऊर्जा मंत्री अनिल शर्मा, आवास एवं शहरी विकास मंत्री सरवीण चौधरी, स्वास्थ्य मंत्री विपिन सिंह परमार, पंचायती राज मंत्री वीरेन्द्र कंवर तथा वन एवं परिवहन मंत्री गोबिन्द सिंह ठाकुर, पूर्व मंत्री एवं पूर्व विधायकगण, मुख्य सचिव विनीत चौधरी, अतिरिक्त मुख्य सचिव एवं मुख्यमंत्री की प्रधान सचिव मनीषा नन्दा, हि.प्र. बागवानी विश्वविद्यालय नौणी के कुलपति डा. एच.सी.शर्मा, कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के कुलपति प्रो.अशोक सरयाल, राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के अतिरिक्त अन्य गणमान्य व्यक्ति व प्रगतिशील किसान भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

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