पर्यावरण के खतरों के प्रति संजीदा हो हिमाचल

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BY- Raman Kant

पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को लेकर पिछले एक दशक में हुए अध्ययनों ने इससे होने वाले विश्वव्यापी खतरों की पोल खोल कर रख दी है। इन अध्ययनों में विश्व के अन्य हिस्सों की तुलना में बर्फ से ढ़के रहने वाले ग्लेशियर वाले क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अधिक देखा जा रहा है। इसके अलावा विश्व की सबसे नई पर्वत श्रृंखला हिमालय को सबसे अधिक संवेदनशील होने का दावा विभिन्न अध्ययन और प्रख्यात पर्यावरणविद् कर चुके हैं। इससे हिमालयी राज्यों खासकर हिमाचल को पर्यावरण संरक्षण के लिए संजीदा होने के साथ इससे निपटने के लिए एक ठोस कार्यक्रम बनाकर उसपर चलने की जरूरत है ताकि भविष्य में होने वाली कम वर्षा, अधिक वर्षा, ओलावृष्टी, बर्फबारी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचा जा सके। एक अध्ययन के अनुसार हिमालय राज्यों में पिछले दस वर्षाें में शेष विश्व की तुलना में 1 प्रतिशत अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके अलावा यहां गर्मियों का तापमान औसतन 40 डिग्री सेल्सियस अधिकत पहुंच गया है और सर्द दिनों की संख्या में तेजी से कमी दर्ज की गई है। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाईमेट चेंच आईपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि 2030 से 2050 के बीच वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाएगी। ऐसे में उसके विनाशकारी परिणाम सामने आएंगे। जबकि शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस सदी के अंत तक तापमान में 3 से 4 डिग्री की वृद्धि हो जाएगी। ऐसे में सबसे संवेदनशील माने जाने वाले हिमालय और हिमाल्यन राज्यों को कार्बन उत्सर्जन को कम करने के साथ तापमान में वृद्धि को बढ़ाने वाले विभिन्न कारणों को जानकर इसे कम करने की दिशा में प्रयास तेज कर देने चाहिए।

पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि हम पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल कर लेते तो काफी हद तक इन आपदाओं को टाला जा सकता था। लेकिन इस बात की उम्मीद बहुत कम है कि दुनिया पैरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल कर पायेगी। ऐसे में हमें इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ सकती है, इसका आंकलन वैज्ञानिकों ने किया है। गौरतलब है कि 2015 पेरिस समझौते का लक्ष्य वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को 2 डिग्री से नीचे रखना है। इस समझौते के तहत दुनिया भर के देशों ने अपने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी करने की बात स्वीकार की थी। संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि अब से लेकर 2030 तक यदि हम हर साल वैश्विक उत्सर्जन में 7 फीसदी की कटौती करेंगे। तब जाकर कहीं 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को हासिल कर पाएंगे।

क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2020 के अनुसार पर्यावरण में आ रहे बदलाव का बुरा असर भारत पर भी पड़ रहा है। इस इंडेक्स के अनुसार भारत पांचवे स्थान पर था। जबकि यदि जान-माल के नुकसान की बात करें तो भारत दूसरे स्थान पर रहा था। जो स्पष्ट तौर पर देश में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे की ओर इशारा हैं। ऐसे में खासकर हिमाचल जैसे हिमालयी राज्यों को प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में पिछले पांच दशकों से काम करने और पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए कश्मीर से कोहिमा तक पैदल यात्रा करने वाले पर्यावरणविद् कुलभुषण उपमन्यू ने भी हिमालय क्षेत्र खासकर हिमाचल में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन में आ रहे बदलावों के प्रति गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि हिमालय में जलवायु परिर्वतन की वजह से पिछले 10 वर्षाें में तापमान में वृद्धि के साथ प्राकृतिक आपदाओं, अधिक वर्षा, ओलावृष्टी, भूस्कखलन आदि जैसी घटनाओं में बेहद बढ़ोतरी हुई है। उनका मानना है कि हिमालयन रिजन में अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा में गर्मी अधिक बढ़ रही है। जिसकी वजह से ग्लेशियर ज्यादा पिघल रहे हैं और इनसे नई झिलों का निर्माण हो रहा है जो बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं को न्यौता दे रही है। इसलिए सरकारों को अपने डेवल्मेंटल माॅडल में बदलाव करते हुए पर्यावरण के साथ सामजस्य और सदभाव को बनाते हुए अक्षय उर्जा को बढ़ावा देना चाहिए ताकि भविष्य में होने वाली त्रासदी से बचा जा सके।

हम पिछले 53 वर्षाें से पर्यावरण दिवस मना रहे हैं लेकिन अभी तक एक दिन के कार्यक्रम से आगे हम इस दिशा में नहीं बढ पाए हैं। ऐसे में हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य को पर्यावरण संरक्षण को एक नई पहल के रूप में शुरू करके पहाड़ी राज्यों के लिए मार्ग प्रशस्त करने की आवश्यक्ता आज के दौर में देखी जा रही है। हिमाचल में आई कई प्राकृतिक आपदाएं जलवायु परिवर्तन की परिचायक हैं। हाल ही में हिमाचल मौसम विभाग की ओर से जारी तीन माह की रिपोर्ट के अुनसार 31 मई 2020 को पिछले 33 वर्षाें में मार्च से मई माह के बीच होने वाली बारीश की तुलना में सबसे अधिक आंका गया है। इसके अलावा इस रिपोर्ट में हिमाचल में 2004 के बाद दूसरी बार सामान्य से 19 फीसदी अधिक बारीश दर्ज की गई है। प्रदेश के दो जिलों लाहौल-स्पीति और किन्नौर को छोड़कर सभी जिलों में सामान्य से अधिक बारीश को पर्यावरण में हो रहे बदलावों के सूचक के रूप में देखा जा सकता है। इसके अलावा पर्यावरण में आ रहे बदलावों की वजह से प्रदेश की 7500 करोड़ रूपये की सेब, फल और सब्जियों की बागवानी को खतरा पैदा हो गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण अप्रैल-मई में बार-बार हो रही ओलावृष्टी की वजह से बागवानों और किसानों की 50 फीसदी से अधिक फसल खराब हो चुकी है। इसलिए इन्हें ध्यान में रखते हुए हमें पर्यावरण संरक्षण के प्रति संजीदा होना होगा और पर्यावरण दिवस को एक दिन के कार्यक्रम न बनाकर सालभर पर्यावरण संरक्षण और इसके प्रति जागरूकता के कार्यक्रम चलाने की जरूरत आज के दौर में देखी जा है।

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