कोविड सेंटर्स में मात्र 115 रुपये का खाना और माननीय हज़ारों रुपये खर्च करवाकर भी नाखुश ..डॉ कुलदीप तंवर

डॉ. तंवर ने कहा... नाचन में निलंबित हुए अधिकारियों का निलंबन तुरंत वापस ले सरकार ...

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मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के गृह क्षेत्र नाचन में मंत्री जी के समर्थकों की खातिरदारी करने में हुई कोताही को लेकर वन विभाग ने अपने दो अधिकारियों के हाथों में निलंबन पत्र थमा दिए थे जिस पर आज डॉ. कुलदीप तंवर ने रोष व्यक्त किया है। उन्होंने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से इस मामले पर तुरंत हस्तक्षेप कर अधिकारियों के निलंबन को रद्द करने का आग्रह किया है।
 उन्होंने प्रदेश सरकार को आड़े हाथों लेकर कहा कि कोविड-19 के दौर में एक तरफ आम जन बेरोज़गारी और अन्य परेशानियों से जूझ रहा है और दूसरी तरफ माननीयों की राजसी खातिरदारी में कोताही पर कर्मचारियों का निलंबन किया जा रहा है जो अफसोसजनक है। उन्होंने कहा कि कोविड सेंटर में जहां कोरोना संक्रमित मरीज़ों सहित वहां काम कर रहे डॉक्टरों और स्टाफ के पूरे दिन के खाने का बजट मात्र 115 रुपये है जिसमें 40 रुपये का दोपहर का खाना, 40 रुपये में रात का खाना और 35 रुपये में नाश्ता दिया जाता है वहीं माननीय के एक दौरे पर हज़ारों रुपये खर्च करने के बाद भी कर्मचारियों को ज़िल्लत, मानसिक दबाव और नौकरी से बाहर होने का डर सहन करना पड़ रहा है। ये सरासर अन्याय है जिसका प्रतिरोध न सिर्फ पीड़ित कर्मचारियों और अधिकारियों को करना चाहिए बहिल्क जनता को भी इसके विरोध में खड़ा होना चाहिए। डॉ. तंवर ने कहा इन मंत्रियों ,विधायकों और सेवा से नाखुश सत्तापक्ष के कार्यकर्ताओं को कोविड सेंटरों में जाकर वहां की दुर्दशा भी देखनी चाहिए ताकि कर्मचारियों से अपनी सेवा करवाने में उन्हें शर्मिंदगी का एहसास हो।


“भारतीय वन सेवा के पूर्व अधिकारी, सेवानिवृत अरण्यपाल और 2005 तक आईएफएस एसोसियेशन के महासचिव रहे डॉ. कुलदीप सिंह तंवर ने नाचन क्षेत्र में बीओ और वन रक्षक के निलंबन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए नाराज़गी जताई है और उन्हें तुरन्त बहाल करने की मांग की है”


खत्म नहीं हुई 73 साल बाद भी वन विभाग में कैम्प अरेंजमेंट की परंपरा :


डॉ. तंवर ने कहा कि अंग्रेज़ों के जाने के 73 साल बाद भी वन विभाग में कैम्प अरेंजमेंट की परंपरा खत्म नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि एक तरफ तो केंद्र और राज्य सरकारें अप्रासंगिक बता कर श्रम कानूनों, किसानों के पक्ष में बने कानूनों, शिक्षा नीति में बदलाव ला रही है और दूसरी तरफ अंग्रेजों के ज़माने से चली आ रही इस तरह की परंपराओं को जारी रखे हुए हैं।


कर्मचारियों पर पड़ता है मंत्रियों और नेताओं की खातिरदारी का बोझ:


डॉ. तंवर ने कहा कि वन एक खुला खज़ाना है जिसकी सुरक्षा का दबाव न केवल वन विभाग के फ्रंट लाइन स्टाफ पर है बल्कि अधिकारियों तक जाता है। इस दबाव में काम करते हुए दौरे पर आने वाले मंत्रियों और नेताओं की खातिरदारी का बोझ भी उन्हीं कर्मचारियों पर पड़ता है जिसके लिए बजट का कोई अलग प्रावधान नहीं है। उन्हें या तो अपनी जेब से पैसा खर्च करना पड़ता है या फिर अनुचित साधनों से पैसा जुटाने की मजबूरी हो जाती है। तबादला नीति न होने और वन सम्पदा की सुरक्षा के नाम पर उनका शोषण किया जा सकता है और इसका इस्तेमाल राजनेताओं और सत्तापक्ष में बैठे लोगों और उनके कार्यकर्ताओं द्वारा खूब होता रहा है।


अन्याय का हो प्रतिरोध:


डॉ.तंवर ने कहा कि मंत्रियों और सहयोगी स्टाफ के साथ-साथ कर्मचारियों को सत्तापक्ष के छुटभईया कार्यकर्ताओं की आवभगत भी करनी पड़ती है जो सरासर अन्यायपूर्ण है। उन्होंने कहा कि 1988-89 में वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के मज़बूत संगठन होने के कारण सरकार और तत्कालीन वन मंत्री को भी झुकना पड़ा था। उन्होंने वन विभाग में सभी संगठनों से अपील की है कि अन्यायपूर्ण मुद्दों के प्रति अधिकारियों और कर्मचारियों के संगठनों को एक साथ आगे आना चाहिए और ऐसी परम्परा को खत्म करना चाहिए।


मुख्यमंत्री करें हस्तक्षेप:


डॉ. तंवर ने मुख्यमंत्री से अपील की है कि वे तुरन्त नाचन वाली घटना में हस्तक्षेप करके वन कर्मचारियों का निलम्बर रद्द करने के आदेश दें और इस घटना पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए बयान जारी करें। डॉ. तँवर ने कहा कि यह उनके गृह जिला का भी मामला है और अगर जन प्रतिनिधियों का इसी तरह का रवैया बना रहा तो कर्मचारियों और अधिकारियों का इसी तरह के दबाव में काम करना पड़ेगा या फिर उनकी तरफ से सरकार को ज़बरदस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा।

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