चीनी उत्पादों का बहिष्कार ,भारतीय बाजार की चुनौतियां और विकल्प :

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रोहित कुमार

पिछले कई हफ्तों से भारत-चीन सीमा विवाद बेहद चर्चा में है ।इस विवाद के कारण दोनों ही देशों के बीच लगातार तनाव की स्थिति बनी हुई है l ऐसे में जब कभी सीमा पर भारत चीन के बीच तनाव बढ़ता है l तब चीनी उत्पादों के बहिष्कार की चर्चा तेज हो जाती है ,मौजूदा तनाव की स्थिति में भी यही होता दिख रहा है चीनी उत्पादों की होली जलाकर उसके बहिष्कार का आह्वान कर रहे हैं एक दूसरे को स्वदेशी अपनाने की सलाह दे रहे हैं, लेकिन भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर इस बाबत कोई दिशानिर्देश जारी नहीं किए हैं। इससे पहले जब डोकलाम विवाद हुआ था चीनी उत्पादों के बहिष्कार की चर्चा लंबे समय तक बहस का मुद्दा बनी थी। भारतीय बाजार में चीनी की मौजूदगी है उसके पास क्या विकल्प है ?क्या यह रास्ता बड़ी आर्थिक ताकत बनाने की ओर ले जा सकेगा? चीन के साथ व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। एकदम से चीनी उत्पादों का बहिष्कार कर अपनी अर्थव्यवस्था को क्या भारत संभाल पाएगा?

चीनी उत्पादों के लिए भारत एक बड़ा बाजार है दोनों देशों के बीच व्यापार को देखें तो 2018-19 में चीन का भारत में निर्यात लगभग 75 बिलियन डॉलर का रहा वहीं चीन में भारत का निर्यात करीब 17 $1 का रहा इन आंकड़ों से पता चलता है कि भारत चीन को निर्यात करता है जबकि आयात करता है । चीन का यह निर्यात का महज 3 फ़ीसदी भारत द्वारा चीन को होने वाला निर्यात उसके कुल निर्यात का 5.3 फीसद है लेकिन भारत के नजरिए से देखे, तो भारत के कुल आयात मे चीन की हिस्सेदारी लगभग 14 फ़ीसदी है जबकि 2013- 14 में भारत के आयात चीन की हिस्सेदारी 11 फीसद थी ।भारत जो चीन से आयात करता है उनमें मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य विनिर्मित वस्तुओं शामिल हैं। जिनकी मांग बहुत ज्यादा है। भारत का बढ़ता हुआ बाजार चीन के लिए एक आकर्षक निवेश गंतव्य है,और इसका उदाहरण चीनी स्मार्टफोन बिजनेस का भारतीय बाजारों में अपनी मजबूत पैठ बना लेना है। हर साल ₹70000 से अधिक का याद दूरसंचार क्षेत्र में करता है। भारत से ज्यादा एक्टिव फार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट का आता है भारत को इसका निर्यात बंद कर दे तो भारत anti-cancer anti-infective जैसी जरूरी दवाएं तैयार नहीं कर सकेगा। चीन पर निर्भरता का आलम यह है कि कुछ दवाओं के लिए तो भारत अस्सी से नब्बे फीसद एपीआई चीन से आयात करता है ।ऐसे ही और मशीनरी ,ऑर्गेनिक केमिकल, फर्टिलाइजर्स ,लौह एवं स्टील के आइटम भी चीन से आयात होता है।

भारत की चीन पर निर्भरता इस कदर बढ़ गई है कि रसोईघर, बेडरूम ,एयर कंडीशनिंग, मशीन ,मोबाइल फोन और डिजिटल के रूप में किसी न किसी रूप में मौजूद है। कृषि उत्पाद, सूती वस्त्र ,हस्तशिल्प उत्पाद  निर्यात करता है यह बताता है कि भारत की राह आसान नहीं है। चीनी उत्पादों के बहिष्कार चीनी उत्पादों के बहिष्कार की आवाज बुलंद हो रही है। भारत में चीनी उत्पाद के बहिष्कार की चर्चा हमेशा ही निर्भर करता है। इलेक्ट्रॉनिक से लेकर उर्वरक तक हम चीन से आयात करते हैं, ऐसे में चीन से आयात को कम करने की कोई भी कोशिश भारतीय उपभोक्ताओं के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। भारत चीन से पूंजीगत वस्तुओं और इंटरमीडिएट प्रोडक्ट्स का भी आयात करता है। ऐसे में चीनी उत्पादों का बहिष्कार घरेलू विनिर्माण प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करेगा, और फिर से देश के निर्यात प्रतिस्पर्धा कम हो जाएगी । कोरोना संकट के दौरान बनने वाली दवा हाइड्रोक्लोरिक काफी चर्चा में रही थी जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप में कोरोनावायरस की प्रतिरोधक दवा के रूप में प्रचारित किया। इसका सबसे बड़ा उत्पादक देश के निर्माण के लिए प्रयोग होने वाला माल आयात किया जाता है। इसकी एक वजह यह है कि यह सामग्री आसानी से इस रूप में भारत की स्थिति में नहीं है तो भी चीन का वैश्विक निर्यात प्रभावित ही रहेगा। इसकी हिस्सेदारी और भारत का व्यापार घाटा $1 का है। करीब 58 बिलीयन डॉलर का है। इतना बड़ा व्यापार घाटा चीन पर हमारी व्यापारिक निर्भरता को प्रदर्शित करता है। ऐसे में चीनी उत्पादों के बहिष्कार से भारत की अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है। इसके अलावा भारतीय चीनी निवेश मुद्दा है। अलीबाबा जैसी कंपनियों ने यूनिकॉर्न कंपनी में निवेश किया है। जो लगभग $1 होता है चीन की बड़ी हिस्सेदारी है इसकी रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि भारत में ऐसी 75 कंपनियां है ,जो ई-कॉमर्स फिनटेक वीडियो सोशल मीडिया एग्रीगेशन सर्विसेस और लॉजिस्टिक्स जैसी सेवाओं में है और इनमें चीन का निवेश है । ऐसे में चीनी उत्पादों का बहिष्कार करना मुश्किल ही जान पड़ता है ।

अगर हिमाचल के संदर्भ की बात करें तो हिमाचल और चीन के बीच शिपकी ला दर्रा से व्यापार होता है. 2018 में  व्यापार 2.52  करोड़  था जो 2019 में बढ़कर तीन करोड़ हो गया है। शिपकी ला दर्रा से लगभग सभी व्यापारी किनौरी ट्राईबल और दलित है इनकी आजीविका का कोई और साधन नहीं है,  क्योंकि पर्यटन एक सालाना प्रक्रिया है तथा ऊंचाई वाले क्षेत्रों में खेती करना असंभव है ऐसे में माना जा सकता है कि हिमाचल  बाजार पर भी चीनी बहिष्कार का असर देखने को मिलेगा।

 कोरोना संकट के मद्देनजर सरकार लोकल वस्तुओं के अपनाने पर जोर दे रही है। प्रधानमंत्री मोदी बार-बार लोगों से आत्मनिर्भर बनने का आह्वान कर रहे हैं। लेकिन निर्भर बनने की राह इतनी आसान नहीं है कि हम अचानक विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने लगे जिस पर हमारी निर्भरता एकदम से नहीं हो जाती उसी तरह वस्तुओं का इस्तेमाल करना भी अचानक नहीं छोड़ सकते। यह एक सतत प्रक्रिया है जिसमें हमें धीरे-धीरे आत्मनिर्भर बनना होगा और विदेशी वस्तुओं को अलविदा कहना होगा जिस प्रकार चीन पर हमारी निर्भरता है उसमें चीनी उत्पादों का बहिष्कार दूर की कौड़ी लगता है। हमें यह भी समझने की जरूरत है कि बहिष्कार प्रगति का उपाय नहीं हो सकता। उदाहरण के लिए दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका ने परमाणु बम गिरा हीरोशीमा और नागासाकी को आर्थिक तौर पर कमजोर कर दिया  परंतु जब तरक्की का दौरा आया तो उसने ना सिर्फ अमेरिकी सामान का बहिष्कार का आह्वान किया ,लेकिन बाजार के खेल में उसने अमेरिका  पीछे छोड़ दिया । भारत में विदेशी कंपनियों का विरोध जायज है लेकिन यह भी समझना होगा की बहिष्कार से तरक्की का रास्ता भी नहीं निकल सकता।

इस बीच भारत के पास विकल्पों की बात करें तो एक विकल्प है कि वह चीन को दिया मोस्ट फेवरड नेशन का दर्जा वापस ले ले। विश्व व्यापार संगठन द्वारा दिए जाने वाला यह दर्जा वापस लेने के बाद भारत चीन से आने वाले सामान पर सीमा शुल्क बढ़ा सकता है। इसे भारत में चीन द्वारा किया गया निर्यात प्रभावित होगा परंतु ध्यान रहे कि भारत जिन उत्पादों के उत्पादन में सक्षम है उन्हीं उत्पादों के संबंध में ऐसा करे, अन्यथा ऐसा करने पर भारत की चिंता बढ़ सकती है  साथ ही भारत को आयात के दूसरे विकल्प भी तलाशने  होंगे।  इससे एक ओर जहां भारत के दूसरे देशों के साथ संबंध अच्छे होंगे वहीं दूसरी ओर चीन के ऊपर निर्भरता कम होगी।

साथ ही भारत अपने विनिर्माण क्षेत्र के विकास की दिशा में तेज गति से आगे बढ़े ,मेक इन इंडिया 2.0 भारत को विनिर्माण हब के रूप में स्थापित करने के लक्ष्य को हासिल करें ,भारत को दूसरे देशों को निर्यात करने की बजाय विनिर्मित वस्तुओं के निर्यात करने पर जोर देना होगा। आत्मनिर्भर बनने के लिए हमें इन बातों पर ध्यान देना होगा। दूसरी ओर विदेशी कंपनियां भारत में एफडीआई करने में भी कम दिलचस्पी ले रही हैं जबकि मेक इन इंडिया रणनीति का मकसद भारत को विनिर्माण हब बनाने के अलावा विनिर्माण में एफडीआई को आकर्षित करना भी है ।लेकिन आंकड़े बताते हैं कि विदेशी निवेशकों ने ज्यादातर सेवा क्षेत्रों में ही निवेश किया है ।आईटी सेक्टर में विदेशी निवेश दिख रहा है और इसकी वजह है कि क्षेत्र में भारत के पास कौशल की समस्या नहीं है। लेकिन विनिर्माण क्षेत्र में भारत को निवेश की जरूरत है वहां कौशल की समस्या होने के कारण विदेशी निवेश संतोषजनक नहीं है ।फिर दूसरी समस्या बुनियादी ढांचे की है बुनियादी ढांचे की कमी के कारण विदेशी निवेशक नहीं कमा पाते जिसके चलते भारत में वे निवेश करते हैं ।वहीं विदेशी सभी सुविधाएं मौजूद हैं जाहिर है भारत को निवेश के लिए बेहतर वातावरण तैयार करना होगा, यदि ये गति पकड़ लेता है तो सामग्री निर्माण क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा, घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ भारत विश्व मे निर्माण क्षेत्र के रूप में उभर सकता है ।और चीन के साथ वैश्विक स्तर पर मुकाबला कर सकता है ।भारत की रुण्णिती प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने और व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की होनी चाहिए, लेकिन समझना होगा कि यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है भारत और चीन के बीच अंतर कम किया जाना जरूरी है आर्थिक विषमता के कम होने पर ही दोनों देशों के बीच गतिरोध की स्थिति में भारत कठोर फैसले ले सकता है ,और आत्मनिर्भर बनने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

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