सच्चा हमसफर

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    ” सुरेश कुमार शर्मा की फेसबुक वॉल से “

    सुरेश कुमार शर्मा

    मोहन को मुम्बई मे किसी लडकी का फोन आता है……
    हैलो …..जी कया मेरी बात मिस्टर मोहन से हो रही है …
    जी…..बोल रहा हूं आप कौन….
    देखिए मोहन जी …..आपकी माता जी अस्पताल मे भर्ती है सिटी अस्पताल मे आप को आने का कह रही है …..

    ये सुनते ही मोहन परेशान हो उठा…
    कयोंकि दिल्ली मे कोई भी उसे नहीं जानता था, और अभी उसका तबादला यू0 पी0 से दिल्ली मे हुआ था, और आँफिस के जरूरी काम से वो मां को अकेले छोडकर मुम्बई आया था ……और तुरंत वो कैसे दिल्ली पहुंच पाएगा….

    उसने दुबारा उसी नम्बर पर फोन किया तो किसी सुधा ने उठाया ओर कहा मोहन जी आपकी माताजी अभी ठीक है….

    मोहन ने उसे पूछा वो उसकी माताजी को कैसे जानती है तो सुधा ने बताया…. मेरे पिता भी यही भर्ती है !

    फिर मोहन ने कहा वो इस वक्त मुम्बई मे है जैसे ही पहली फ्लाइट मिलती है वो आ जाएगा मगर तब तक मां की देखभाल कैसे होगी ….इसलिए आप किसी डाक्टर या नर्स से मेरी बात करवा दीजिए…..

    मोहन जी …..जब-तक आप नही आते उनकी देखभाल के लिए मैं हूं आप परेशान ना हो मेरी उनसे बात हो गई है वह मेरी मां समान है ….

    मोहन वापस दिल्ली पहुंचा मगर एक दिन लग गया ….वह तुरंत अस्पताल पहुंचा अस्पताल मे मां के बैड के बाजू मे एक बुजुर्ग आदमी का बैड था और दोनो के बीच बैठी लडकी सीधी साधी खूबसूरत सी …शायद यही सुधा होगी…..

    मां से मिला तो पता चला कि उनका एक्सीडेंट हो गया कोई अस्पताल के बाहर छोड़ गया था तबसे साथ बैठी अपने पिताजी की देखभाल कर रही सुधा ने उनकी सेवा की ….बिल्कुल एक बेटी की तरह…..

    सुधा के पिता दिल के मरीज थे इसलिए भर्ती थे मोहन ने सुधा का धन्यवाद किया और बदले मे कुछ पैसे देना चाहा तो सुधा ने साफ इंकार कर दिया !

    वह बोली मां-बाप की सेवा नसीब वालों को मिलती है वैसे मे नौकरी करके इतना कमा लेती हूँ कि अपना और पिताजी का खर्चा उठा सकूं…..

    उसी शाम तक मोहन कि माताजी की छुट्टी हो गई घर पर भी मोहन को सुधा का चेहरा उसकी बातें याद आती रही…..जैसे सुधा ने उसकी माताजी का ध्यान रखा तो एक शिष्टाचार के नाते उसे भी सुधा के पिताजी का हालचाल पूछने जाना चाहिए यही सोचकर अगले दिन जब मोहन अस्पताल पहुंचा तो ना सुधा दिखी ना उसके पिता….

    पूछने पर पता चला कल रात आए एक अटैक से सुधा के पिताजी का देहांत हो गया ….

    मोहन ने अस्पताल से उनका पता लिया फिर वह तेजी से सुधा के घर पहुंचा तो देखा रिश्तेदारो मे उसकी बुआ और चाची थी जो उसे ताने दे रही थी पहले मां को खा गई और अब बाप को …

    मोहन ने पडोसियो के साथ मिलकर अंतिम क्रिया को अंजाम दिया….
    घर जाकर मां को सब बताया तो मां कुछ खाना लेकर मोहन के साथ सुधा के घर पहुची तब भी बुआ और चाची उसे ताने दे रही थी….

    वो दोनों सुधा की जिम्मेदारी नही लेना चाहती थी एक जवान लडकी उसकी शादी करवाने के लिए होनेवाले खर्चे को लेकर दोनों अपना अपना पल्ला झाड़ने मे लगी हुई थी इसपर मोहन बोला-आंटी आप चिंता ना करे….

    सुधा के दो रिश्तेदार अभी भी इसी शहर में मौजूद है… एक उसकी माँ दूसरा उसका होने वाला पति …
    मोहन कि बात सुनकर मां ने उसे गले लगा लिया…

    फिर मां मोहन से बोली – आजतक मे तुझे शादी के लिए कहती रही अनेकों लडकियों के रिश्ते फोटो बताए मगर तूने हमेशा कोई ना कोई बहाना बनाकर मना कर दिया फिर आज अचानक ….आखिर ये चमत्कार कैसे हुआ …. मोहन बोला मां जो लडकी आपको बिना जाने आपकी सेवा कर सकती है अपने पिता की देखभाल कर सकती है उससे अच्छी लडकी मुझे पत्नी के रूप मे कही नही मिलेगी….लेकिन शादी के लिए एक लडके के साथ साथ एक लडकी की भी स्वीकृति जरूरी होती है ….

    मां ने सुधा की और देखा और उसकी इच्छा जाननी चाही तो उसका जबाब था ….

    जो इंसान एक बेटा बनकर मेरे पिता का अंतिम संस्कार कर सकता है ….उससे अच्छा पति एक सच्चा हमसफर मुझे कहा मिलेगा फिर सुधा के पिता के अंतिम क्रिया तेरहवीं करने के बाद दोनों की शादी सादगी से हो गई….

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